Darbhanga Parvati Devi Siki Grass Magic Model: जिसे लोग अक्सर बेकार 'जंगल-झाड़' समझकर उखाड़ फेंकते हैं. उसे दरभंगा की पार्वती देवी ने अपनी कला से सुनहरी कमाई का जरिया बना लिया है. सिकी कला में प्रशिक्षित पार्वती देवी आज इस पारंपरिक घास से ऐसे कलात्मक उत्पाद तैयार कर रही हैं. जिनकी बाजार में भारी मांग है. पार्वती बताती हैं कि वह जंगलों में उपजने वाली सिकी घास को ₹500 प्रति किलो की दर से खरीदती हैं. इसके बाद इसे उबालकर और विभिन्न रंगों में डाई करके सुखाया जाता है. सुखाने के बाद शुरू होता है कलाकारी का असली जादू. वह सिकी से आकर्षक चंगेरी, फूलदान, रोटी का डिब्बा, गुलदस्ता, पंखा और सजावटी कछुआ-मछली जैसे उत्पाद बनाती हैं. इन उत्पादों की कीमत ₹150 से लेकर ₹2000 तक होती है. जहां छोटी फूलडलिया ₹150 में बिकती है. वहीं बड़ी चंगेरी ₹2000 तक में बिकती है. आज पार्वती न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि अपनी इस हस्तशिल्प कला के जरिए मिथिला की प्राचीन विरासत को भी जीवित रख रही हैं.
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Darbhanga Parvati Devi Siki Grass Magic Model: जिसे लोग अक्सर बेकार 'जंगल-झाड़' समझकर उखाड़ फेंकते हैं. उसे दरभंगा की पार्वती देवी ने अपनी कला से सुनहरी कमाई का जरिया बना लिया है. सिकी कला में प्रशिक्षित पार्वती देवी आज इस पारंपरिक घास से ऐसे कलात्मक उत्पाद तैयार कर रही हैं. जिनकी बाजार में भारी मांग है. पार्वती बताती हैं कि वह जंगलों में उपजने वाली सिकी घास को ₹500 प्रति किलो की दर से खरीदती हैं. इसके बाद इसे उबालकर और विभिन्न रंगों में डाई करके सुखाया जाता है. सुखाने के बाद शुरू होता है कलाकारी का असली जादू. वह सिकी से आकर्षक चंगेरी, फूलदान, रोटी का डिब्बा, गुलदस्ता, पंखा और सजावटी कछुआ-मछली जैसे उत्पाद बनाती हैं. इन उत्पादों की कीमत ₹150 से लेकर ₹2000 तक होती है. जहां छोटी फूलडलिया ₹150 में बिकती है. वहीं बड़ी चंगेरी ₹2000 तक में बिकती है. आज पार्वती न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि अपनी इस हस्तशिल्प कला के जरिए मिथिला की प्राचीन विरासत को भी जीवित रख रही हैं.
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Darbhanga Parvati Devi Siki Grass Magic Model: जिसे लोग अक्सर बेकार 'जंगल-झाड़' समझकर उखाड़ फेंकते हैं. उसे दरभंगा की पार्वती देवी ने अपनी कला से सुनहरी कमाई का जरिया बना लिया है. सिकी कला में प्रशिक्षित पार्वती देवी आज इस पारंपरिक घास से ऐसे कलात्मक उत्पाद तैयार कर रही हैं. जिनकी बाजार में भारी मांग है. पार्वती बताती हैं कि वह जंगलों में उपजने वाली सिकी घास को ₹500 प्रति किलो की दर से खरीदती हैं. इसके बाद इसे उबालकर और विभिन्न रंगों में डाई करके सुखाया जाता है. सुखाने के बाद शुरू होता है कलाकारी का असली जादू. वह सिकी से आकर्षक चंगेरी, फूलदान, रोटी का डिब्बा, गुलदस्ता, पंखा और सजावटी कछुआ-मछली जैसे उत्पाद बनाती हैं. इन उत्पादों की कीमत ₹150 से लेकर ₹2000 तक होती है. जहां छोटी फूलडलिया ₹150 में बिकती है. वहीं बड़ी चंगेरी ₹2000 तक में बिकती है. आज पार्वती न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि अपनी इस हस्तशिल्प कला के जरिए मिथिला की प्राचीन विरासत को भी जीवित रख रही हैं.
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